"मुहब्बत"
मेरे आँसू कब ठिकाने लगेंगे
इन्हें रुकने में ज़माने लगेंगे
तुझे चाहा था इस क़दर मैं ने
ख़ुद को ही दिए ये दर्द मैं ने
मेरी मुहब्बत तुझे क्यूँ रास न आई
इतना रोया की साँस तक न आई
दुआ है तेरी आँखों को भी कोई भाए
तू इज़हार करे और वो तुझे ठुकराए
तू इतनी रोए की तेरी आँखों का पानी सूख जाए
मेरी बद-दुआ है तुझे भी किसी से मुहब्बत हो जाए
मेरी तकलीफ़ तुझे तब समझ आएगी
तो रोना तो चाहेगी मगर रो नहीं पाएगी
अगर आँसू बहेंगे तो बे-हिसाब बहेंगे
तू पोछती रहना मगर नहीं रुकेंगे
मुहब्बत ठुकराने का दर्द तब तू जानेगी
एक एक आँसू की क़ीमत तब तू पहचानेगी
दुआ करेगी मेरी हाथों से ये मुहब्बत के लकीरें ही मिट जाएँ
मेरी बद-दुआ है तुझे भी किसी से मुहब्बत हो जाए















