अगर हमारा तुम्हारा विसाल हो जाए
हरीफ़-ए-इश्क़ का जीना मुहाल हो जाए
जहाँ में जो भी तिरा हम-ख़याल हो जाए
वो शख़्स रब की क़सम बे-मिसाल हो जाए
निगाह-ए-इश्क़ से गर हम इसे नहीं देखें
तो ख़त्म सब तिरा हुस्न-ओ-जमाल हो जाए
कोई तो बर सर-ए-महफ़िल तुम्हारा ज़िक्र करे
निढाल बैठे हैं हम दिल-बहाल हो जाए
ख़ुदा करे कि किसी दिन हमारे दिल की तरह
हर एक ख़्वाब तिरा पाएमाल हो जाए
रिदा-ए-लम्स जो क़ल्ब-ए-मरीज़ पर रख दो
हमारी थोड़ी तबीयत बहाल हो जाए
फ़िराक़-ए-यार का इतना मलाल कीजे 'शजर'
शब-ए-फ़िराक़ में ही इंतिक़ाल हो जाए
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