चमन में शाख़-ए-शजर से गुलाब टूट गया
लो आज फिर मिरी आँखों का ख़्वाब टूट गया
ये कैसा क़ल्ब-ए-फ़लक पर अज़ाब टूट गया
सितारा टूट गया आफ़ताब टूट गया
तमाम 'उम्र गुज़र जाएगी मरम्मत में
कि इस क़दर दिल-ए-ख़ाना ख़राब टूट गया
किताब-ए-इश्क़ में बाब-ए-वफ़ा-ओ-वस्ल न रख
था उनसे रिश्ता-ए-नुदरत-मआब टूट गया
परिंद जब से वतन छोड़कर सफ़र पे गए
शजर को देखो शजर बे-हिसाब टूट गया
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