आप से है ये इल्तिजा साहब
मुझको बतला दो मयक़दा साहब
हैफ़ होता है कैफ़ियत पे मुझे
इससे बढ़कर कहूँ भी क्या साहब
फूल मुरझाए खिल गए सारे
उसने क्या जाने कह दिया साहब
इस बरस उसकी यौम-ए-आमद पर
मैंने देनी है एक रिदा साहब
आओ आकर क़रीब बैठो मेरे
दरमियाँ क्यूँ है फ़ासला साहब
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Shajar Abbas
our suggestion based on Shajar Abbas
As you were reading Basant Shayari Shayari