Ghani Ejaz

Ghani Ejaz

@ghani-ejaz

Ghani Ejaz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ghani Ejaz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

21

Likes

35

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

गिरेगी कौन सी छत पे ये कब किसे मालूम कटी पतंग हवाओं के इम्तिहान में है — Ghani Ejaz

Ghazal

जुनूँ में देर से ख़ुद को पुकारता हूँ मैं जो ग़म है दामन-ए-सहरा में वो सदा हूँ मैं बदल गया है ज़माना बदल गया हूँ मैं अब अपनी सम्त भी हैरत से देखता हूँ मैं हयात एक सज़ा है भगत रहा हूँ मैं दर-ए-क़ुबूल से लौटी हुई दुआ हूँ मैं जिसे ख़ुद आप ही अपने पे प्यार आ जाए जफ़ा के दौर में वो लग़्ज़िश-ए-वफ़ा हूँ मैं जमाल-ए-यार की रानाइयाँ मआज़-अल्लाह निगाह बन के नज़ारों में खो गया हूँ मैं बस एक जुम्बिश-ए-लब तक वजूद है जिस का ज़बान-ए-शौक़ पे वो हर्फ़-ए-मुद्दआ' हूँ मैं अगर है जुर्म मोहब्बत तो फिर तकल्लुफ़ क्या मदार-ए-जुर्म हूँ तक़्सीर हूँ ख़ता हूँ मैं रफ़ाक़तों के ये फ़ानूस ता-ब-कै 'ए'जाज़' हवा की ज़द पे लरज़ता हुआ दिया हूँ मैं — Ghani Ejaz
आइना हूँ एक हैरानी मिरे चारों तरफ़ लम्हा लम्हा हश्र-सामानी मिरे चारों तरफ़ बहर-ए-इस्याँ में घिरा नन्हे जज़ीरे सा वो मैं और फिर हद्द-ए-नज़र पानी मिरे चारों तरफ़ जुर्म है मा'सूमियत मा'तूब है दीवानगी है ख़िरद-मंदों की नादानी मिरे चारों तरफ़ वक़्फ़े वक़्फ़े से यहाँ उठने लगे हैं गर्द-बाद हर तरफ़ माहौल तूफ़ानी मिरे चारों तरफ़ बस्तियाँ जितनी भी थीं शहर-ए-ख़मोशाँ हो गईं हो गई आबाद वीरानी मिरे चारों तरफ़ मैं कि हूँ हर हाल में चश्म-ए-तवज्जोह का शिकार है तग़ाफ़ुल की निगहबानी मिरे चारों तरफ़ कौन है जब्र-ओ-सज़ा का मुस्तहिक़ मेरे सिवा है जो बद-ख़्वाहों की सुलतानी मिरे चारों तरफ़ — Ghani Ejaz
बे-वफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं वो न आएगा फिर भी इंतिज़ार करते हैं लोग अब मोहब्बत में कारोबार करते हैं दिल बचा के रखते हैं जाँ शिकार करते हैं इशरतें जहाँ-भर की बस उन्हीं का हिस्सा है जो रविश ज़माने की इख़्तियार करते हैं शख़्सियत में झांकें तो और ही तमाशा है बातें जो नसीहत की बे-शुमार करते हैं अपने दम-क़दम से तो दश्त भी गुलिस्ताँ है हम जो ख़ारज़ारों को लाला-ज़ार करते हैं जान से गुज़रते हैं बे-ख़ुदी में अहल-ए-दिल वो जो चश्म-ए-पुर-फ़न को जुल्फ़िक़ार करते हैं हों शगूफ़े शाख़ों के या लवें चराग़ों की सब हवा के दामन पर इंहिसार करते हैं हम कहाँ के दाना हैं किस हुनर में यकता हैं लोग फिर भी जाने क्यूँँ हम से प्यार करते हैं जिस जगह पे ख़दशा हो पैर के फिसलने का हम क़दम वहीं 'ए'जाज़' उस्तुवार करते हैं — Ghani Ejaz
तुम्हें ख़बर भी है ये तुम ने किस से क्या माँगा भँवर में डूबने वालों से आसरा माँगा सुने जो मेरे अज़ाएम तो आज़माने को हवा से बर्क़ ने घर का मिरे पता माँगा ख़ुद अपनी राह बनाता गया पहाड़ों में कभी कहाँ किसी दरिया ने रास्ता माँगा जो आप अपने अँधेरों से बद-हवा से हुई शब-ए-सियाह ने घबरा के इक दिया माँगा कहीं भी हो कोई नेकी बराए नेकी हो वहीं पे हो गई ज़ाएअ'' अगर सिला माँगा ख़ुदा की देन के मोहताज-ए-बंदगान-ए-ख़ुदा ये क्या कि माँगने वालों से जा-ब-जा माँगा हमें जो इश्क़ में होना था सुर्ख़-रू 'ए'जाज़' तो हम ने जान-ए-हज़ीं क़ल्ब-ए-मुब्तला माँगा — Ghani Ejaz
कोई हमराह नहीं राह की मुश्किल के सिवा हासिल-ए-उम्र भी क्या है ग़म-ए-हासिल के सिवा एक सन्नाटा मुसल्लत था गुज़रगाहों पर ज़िंदगी थी भी कहाँ कूचा-ए-क़ातिल के सिवा हर क़दम हादसे हर गाम मराहिल थे यहाँ अपने क़दमों में हर इक शय रही मंज़िल के सिवा था मिसाली जो ज़माने में समुंदर का सुकूत कौन तूफ़ान उठाता रहा साहिल के सिवा अपने मरकज़ से हर इक चीज़ गुरेज़ाँ निकली लैला हर बज़्म में थी ख़ल्वत-ए-महमिल के सिवा अपनी राहों में तो ख़ुद बोए हैं काँटे उस ने दुश्मन-ए-दिल कि नहीं और कोई दिल के सिवा अपनी तक़दीर था बर्बाद-ए-मोहब्बत होना महफ़िलें और भी थीं आप की महफ़िल के सिवा — Ghani Ejaz
सर-फिरी तुंद हवा हम भी नहीं तुम भी नहीं मुल्क-दुश्मन ब-ख़ुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं बज़्म-ए-आलम में सदा हम भी नहीं तुम भी नहीं मुंकिर-ए-रोज़-ए-जज़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं किस के ईमा पे है ये ख़ून-ख़राबा ये फ़साद क़ाइल-ए-जौर-ओ-जफ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं जान आपस की बुराई में गँवा दें अपनी इस क़दर ख़ुद से ख़फ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं हम को दस्तूर ने बख़्शे हैं बराबर के हुक़ूक़ कोई कमतर न सिवा हम भी नहीं तुम भी नहीं जज़्ब है ख़ाक-ए-वतन में जो बुज़ुर्गों का लहू इस की मिट्टी से जुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं — Ghani Ejaz
अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा वो मुझ से ख़ुश रहे तो ज़माना ख़फ़ा रहा आलम हयात का न कभी एक सा रहा दुनिया में ज़िंदगी का तमाशा बना रहा था हर क़दम पे अपने अज़ाएम का इम्तिहाँ हर गाम हादसात का महशर बपा रहा फूलों की अहद गुल में तिजारत तो ख़ूब की पूछे कोई कि दामन-ए-गुलचीं में क्या रहा बार-ए-गराँ था मेरे लिए अरसा-ए-हयात जीने का तेरे ग़म से बहुत हौसला रहा हर फ़िक्र हर अमल का है निय्यत पे इंहिसार शैख़-ए-हरम भी बंदा-ए-हिर्स-ओ-हवा रहा दुनिया अमल की राह में आगे निकल गई ज़ाहिद तो ख़ानक़ाह में महव-ए-दुआ रहा हम लाख मुस्कुराए तबस्सुम की ओट से सोज़-ए-ग़म-ए-हयात मगर झाँकता रहा 'ए'जाज़' अहल-ए-जौर से नफ़रत रही उन्हें हर ज़ुल्म उन की बज़्म में लेकिन रवा रहा — Ghani Ejaz
बज़्म-ए-आलम में सदा हम भी नहीं तुम भी नहीं मुंकिर-ए-रोज़-ए-जज़ा तुम भी नहीं हम भी नहीं सर-फिरी तुंद हवा हम भी नहीं तुम भी नहीं मुल्क-दुश्मन ब-ख़ुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं किस के ईमा पे है ये ख़ून-ख़राबा ये फ़साद क़ाइल-ए-जौ-ओ-जफ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं जान आपस की बुराई में गँवा दें अपनी इस क़दर ख़ुद से ख़फ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं हम को दस्तूर ने बख़्शे हैं बराबर के हुक़ूक़ कोई कमतर न सिवा हम भी नहीं तुम भी नहीं जज़्ब है ख़ाक-ए-वतन में जो बुज़ुर्गों का लहू इस की मिट्टी से जुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं — Ghani Ejaz