तिश्ना-लब हूँ उदास बैठा हूँ

मैं समुंदर के पास बैठा हूँ

वो निगाहें चुराए बैठे हैं
मैं सरापा सिपास बैठा हूँ

मैं भी क्या क़ातिलों की बस्ती में
ले के जीने की आस बैठा हूँ

आप क्या ज़र्फ़ आज़माते हैं
पी के बरसों की प्यास बैठा हूँ

इक मुकम्मल किताब था पहले
हो के अब इक़्तिबास बैठा हूँ

आख़िरी दिन हैं उम्र के 'ए'जाज़'
क़ब्र के आस-पास बैठा हूँ

— Ghani Ejaz

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