जौर-ए-बे-जा को जो कहते हो बजा है वो भी
दस्त-ए-क़ातिल पे लहू है कि हिना है वो भी
लोग ख़ुश हैं उसे दे दे के इबादत का फ़रेब
वो मगर ख़ूब समझता है ख़ुदा है वो भी
आज बस आज है क्या ज़िक्र गुज़शता कल का
लाख सोना सही मिट्टी में दबा है वो भी
तुम जिसे जब्र-ओ-सितम क़हर-ओ-ग़ज़ब कहते हो
अपने आ'माल की दर-अस्ल सज़ा है वो भी
चारा-गर भूल गए हों तो बता दो 'ए'जाज़'
ज़हर कहते हैं जिसे एक दवा है वो भी
— Ghani Ejaz















