bijli giri to soch ke sab taar kat ga.e | बिजली गिरी तो सोच के सब तार कट गए

  - Ghani Ejaz

बिजली गिरी तो सोच के सब तार कट गए
यक-लख़्त रौशनी से अंधेरे लिपट गए

सहरा-नवर्दियों में तो महफ़ूज़ थे मगर
शहरों के आस-पास ही खे़
में उलट गए

मिलने को चंद रोज़ मिले थे सुकून के
दिन अपनी 'उम्र के तो बहर-हाल घट गए

साए कि फैलते ही चले थे ज़मीन पर
सूरज ने जूँही आँख दिखाई सिमट गए

अंजाम-ए-कार ख़ुद ही शिकारी थे जाल में
'एजाज़' अहल-ए-जौर के पाँसे पलट गए

  - Ghani Ejaz

Sukoon Shayari

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