आइना हूँ एक हैरानी मिरे चारों तरफ़

लम्हा लम्हा हश्र-सामानी मिरे चारों तरफ़

बहर-ए-इस्याँ में घिरा नन्हे जज़ीरे सा वो मैं
और फिर हद्द-ए-नज़र पानी मिरे चारों तरफ़

जुर्म है मा'सूमियत मा'तूब है दीवानगी
है ख़िरद-मंदों की नादानी मिरे चारों तरफ़

वक़्फ़े वक़्फ़े से यहाँ उठने लगे हैं गर्द-बाद
हर तरफ़ माहौल तूफ़ानी मिरे चारों तरफ़

बस्तियाँ जितनी भी थीं शहर-ए-ख़मोशाँ हो गईं
हो गई आबाद वीरानी मिरे चारों तरफ़

मैं कि हूँ हर हाल में चश्म-ए-तवज्जोह का शिकार
है तग़ाफ़ुल की निगहबानी मिरे चारों तरफ़

कौन है जब्र-ओ-सज़ा का मुस्तहिक़ मेरे सिवा
है जो बद-ख़्वाहों की सुलतानी मिरे चारों तरफ़

— Ghani Ejaz

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