परिंदा हद्द-ए-नज़र तक जो आसमान में है
परों में ज़ोर कहाँ हौसला उड़ान में है
अभी से भीग रहा है हदफ़ पसीने में
कि तीर छूटा नहीं है अभी कमान में है
गिरेगी कौन सी छत पे ये कब किसे मालूम
कटी पतंग हवाओं के इम्तिहान में है
सुकून-ए-क़ल्ब को महलों में ढूँडने वालो
सुकून-ए-क़ल्ब फ़क़ीरों के ख़ानदान में है
ख़रीदना है जो तोहफ़ा तुम्हें मोहब्बत का
मिलेगा दिल के एवज़ दर्द की दुकान में है
हयात-ओ-मौत फ़क़त नाम घर बदलने का
समेट रक्खा है सामान साएबान में है
— Ghani Ejaz















