Ghani Ejaz

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    गिरेगी कौन सी छत पे ये कब किसे मालूम
    कटी पतंग हवाओं के इम्तिहान में है
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    अधूरी ना-शुनीदा दास्ताँ हूँ
    कि शायद मैं समाअ'त पर गराँ हूँ

    ख़यालों में भी कुछ वाज़ेह नहीं है
    यक़ीं की गोद में पलता गुमाँ हूँ

    लब-ए-इज़हार चुप है मेरी ख़ातिर
    अभी हाँ और नहीं के दरमियाँ हूँ

    बुलंदी पर हवा ले जा रही है
    चराग़-ए-जिस्म से उठता धुआँ हूँ

    कशिश बाज़ार की रोके हुए है
    अभी मैं अपने घर पहुँचा कहाँ हूँ

    मुझे पाओगे दिल के पास हर दम
    जहाँ महसूस कर लोगे वहाँ हूँ

    मिरे अंदर है पोशीदा क़यामत
    कमाल-ए-ज़ब्त का इक इम्तिहाँ हूँ

    हुए 'एजाज़' बूढ़े तुम मगर मैं
    ख़ुदा के फ़ज़्ल से अब तक जवाँ हूँ
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    आइना हूँ एक हैरानी मिरे चारों तरफ़
    लम्हा लम्हा हश्र-सामानी मिरे चारों तरफ़

    बहर-ए-इस्याँ में घिरा नन्हे जज़ीरे सा वो मैं
    और फिर हद्द-ए-नज़र पानी मिरे चारों तरफ़

    जुर्म है मा'सूमियत मा'तूब है दीवानगी
    है ख़िरद-मंदों की नादानी मिरे चारों तरफ़

    वक़्फ़े वक़्फ़े से यहाँ उठने लगे हैं गर्द-बाद
    हर तरफ़ माहौल तूफ़ानी मिरे चारों तरफ़

    बस्तियाँ जितनी भी थीं शहर-ए-ख़मोशाँ हो गईं
    हो गई आबाद वीरानी मिरे चारों तरफ़

    मैं कि हूँ हर हाल में चश्म-ए-तवज्जोह का शिकार
    है तग़ाफ़ुल की निगहबानी मिरे चारों तरफ़

    कौन है जब्र-ओ-सज़ा का मुस्तहिक़ मेरे सिवा
    है जो बद-ख़्वाहों की सुल्तानी मिरे चारों तरफ़
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    बिजली गिरी तो सोच के सब तार कट गए
    यक-लख़्त रौशनी से अंधेरे लिपट गए

    सहरा-नवर्दियों में तो महफ़ूज़ थे मगर
    शहरों के आस-पास ही खे़मे उलट गए

    मिलने को चंद रोज़ मिले थे सुकून के
    दिन अपनी उम्र के तो बहर-हाल घट गए

    साए कि फैलते ही चले थे ज़मीन पर
    सूरज ने जूँही आँख दिखाई सिमट गए

    अंजाम-ए-कार ख़ुद ही शिकारी थे जाल में
    'एजाज़' अहल-ए-जौर के पाँसे पलट गए
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    परिंदा हद्द-ए-नज़र तक जो आसमान में है
    परों में ज़ोर कहाँ हौसला उड़ान में है

    अभी से भीग रहा है हदफ़ पसीने में
    कि तीर छूटा नहीं है अभी कमान में है

    गिरेगी कौन सी छत पे ये कब किसे मालूम
    कटी पतंग हवाओं के इम्तिहान में है

    सुकून-ए-क़ल्ब को महलों में ढूँडने वालो
    सुकून-ए-क़ल्ब फ़क़ीरों के ख़ानदान में है

    ख़रीदना है जो तोहफ़ा तुम्हें मोहब्बत का
    मिलेगा दिल के एवज़ दर्द की दुकान में है

    हयात-ओ-मौत फ़क़त नाम घर बदलने का
    समेट रक्खा है सामान साएबान में है
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    सर-फिरी तुंद हवा हम भी नहीं तुम भी नहीं
    मुल्क-दुश्मन ब-ख़ुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं

    बज़्म-ए-आलम में सदा हम भी नहीं तुम भी नहीं
    मुंकिर-ए-रोज़-ए-जज़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं

    किस के ईमा पे है ये ख़ून-ख़राबा ये फ़साद
    क़ाइल-ए-जौर-ओ-जफ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं

    जान आपस की बुराई में गँवा दें अपनी
    इस क़दर ख़ुद से ख़फ़ा हम भी नहीं तुम भी नहीं

    हम को दस्तूर ने बख़्शे हैं बराबर के हुक़ूक़
    कोई कमतर न सिवा हम भी नहीं तुम भी नहीं

    जज़्ब है ख़ाक-ए-वतन में जो बुज़ुर्गों का लहू
    इस की मिट्टी से जुदा हम भी नहीं तुम भी नहीं
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    तिश्ना-लब हूँ उदास बैठा हूँ
    मैं समुंदर के पास बैठा हूँ

    वो निगाहें चुराए बैठे हैं
    मैं सरापा सिपास बैठा हूँ

    मैं भी क्या क़ातिलों की बस्ती में
    ले के जीने की आस बैठा हूँ

    आप क्या ज़र्फ़ आज़माते हैं
    पी के बरसों की प्यास बैठा हूँ

    इक मुकम्मल किताब था पहले
    हो के अब इक़्तिबास बैठा हूँ

    आख़िरी दिन हैं उम्र के 'एजाज़'
    क़ब्र के आस-पास बैठा हूँ
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    अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा
    वो मुझ से ख़ुश रहे तो ज़माना ख़फ़ा रहा

    आलम हयात का न कभी एक सा रहा
    दुनिया में ज़िंदगी का तमाशा बना रहा

    था हर क़दम पे अपने अज़ाएम का इम्तिहाँ
    हर गाम हादसात का महशर बपा रहा

    फूलों की अहद गुल में तिजारत तो ख़ूब की
    पूछे कोई कि दामन-ए-गुलचीं में क्या रहा

    बार-ए-गराँ था मेरे लिए अरसा-ए-हयात
    जीने का तेरे ग़म से बहुत हौसला रहा

    हर फ़िक्र हर अमल का है निय्यत पे इंहिसार
    शैख़-ए-हरम भी बंदा-ए-हिर्स-ओ-हवा रहा

    दुनिया अमल की राह में आगे निकल गई
    ज़ाहिद तो ख़ानक़ाह में महव-ए-दुआ रहा

    हम लाख मुस्कुराए तबस्सुम की ओट से
    सोज़-ए-ग़म-ए-हयात मगर झाँकता रहा

    'एजाज़' अहल-ए-जौर से नफ़रत रही उन्हें
    हर ज़ुल्म उन की बज़्म में लेकिन रवा रहा
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    तुम्हें ख़बर भी है ये तुम ने किस से क्या माँगा
    भँवर में डूबने वालों से आसरा माँगा

    सुने जो मेरे अज़ाएम तो आज़माने को
    हवा से बर्क़ ने घर का मिरे पता माँगा

    ख़ुद अपनी राह बनाता गया पहाड़ों में
    कभी कहाँ किसी दरिया ने रास्ता माँगा

    जो आप अपने अंधेरों से बद-हवास हुई
    शब-ए-सियाह ने घबरा के इक दिया माँगा

    कहीं भी हो कोई नेकी बराए नेकी हो
    वहीं पे हो गई ज़ाएअ' अगर सिला माँगा

    ख़ुदा की देन के मोहताज-ए-बंदगान-ए-ख़ुदा
    ये क्या कि माँगने वालों से जा-ब-जा माँगा

    हमें जो इश्क़ में होना था सुर्ख़-रू 'एजाज़'
    तो हम ने जान-ए-हज़ीं क़ल्ब-ए-मुब्तला माँगा
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    कोई हमराह नहीं राह की मुश्किल के सिवा
    हासिल-ए-उम्र भी क्या है ग़म-ए-हासिल के सिवा

    एक सन्नाटा मुसल्लत था गुज़रगाहों पर
    ज़िंदगी थी भी कहाँ कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

    हर क़दम हादसे हर गाम मराहिल थे यहाँ
    अपने क़दमों में हर इक शय रही मंज़िल के सिवा

    था मिसाली जो ज़माने में समुंदर का सुकूत
    कौन तूफ़ान उठाता रहा साहिल के सिवा

    अपने मरकज़ से हर इक चीज़ गुरेज़ाँ निकली
    लैला हर बज़्म में थी ख़ल्वत-ए-महमिल के सिवा

    अपनी राहों में तो ख़ुद बोए हैं काँटे उस ने
    दुश्मन-ए-दिल कि नहीं और कोई दिल के सिवा

    अपनी तक़दीर था बरबाद-ए-मोहब्बत होना
    महफ़िलें और भी थीं आप की महफ़िल के सिवा
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