कभी इधर तो कभी हम उधर तलाशते हैं
अमाँ के वास्ते छोटा सा घर तलाशते हैं
ख़िज़ाँ के बाद चमन में बहार आई है
परिंद फिर से नए बाल-ओ-पर तलाशते हैं
अरे वो छोड़ गया ख़ाक डालो आओ चलो
सफ़र में कोई नया हम-सफ़र तलाशते हैं
तमाम शहर तलाश-ए-रह-ए-सुकून में है
यहाँ पे हम हैं रह-ए-पुर-ख़तर तलाशते हैं
बरस से हिज्र की इस चिलचिलाती-धूप में हम
भटक के दश्त में हर सू शजर तलाशते हैं
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