मुस्कुराते खिलखिलाते से चमन को छोड़कर
लाडले परदेस जाते हैं वतन को छोड़कर
चंद लम्हों की सुकूनत के लिए हँसते हुए
क़ैदख़ाने आ गए घर की घुटन को छोड़कर
अर्श वालों की तरह हम फ़र्श वाले भी शजर
रह नहीं सकते दयार-ए-पंजतन को छोड़कर
As you were reading Shayari by Shajar Abbas
our suggestion based on Shajar Abbas
As you were reading undefined Shayari