शिकस्ता दिल की मरम्मत कोई नहीं करता
मरीज़ हूँ मैं अयादत कोई नहीं करता
ख़ुदा का शुक्र मिरे शहर और क़बीले में
सितमगरों की हिमायत कोई नहीं करता
किसी को जिस्म किसी को हवस है दौलत की
बिना ग़रज़ के मुहब्बत कोई नहीं करता
अमीर-ए-शहर को झुककर सलाम करते हैं
ग़रीब-ए-शहर की इज़्ज़त कोई नहीं करता
ये लोग ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ पे तंज करते हैं
इन्हें बनाने की ज़हमत कोई नहीं करता
उसूल-ए-इश्क़ बदल डाले नौजवानों ने
फ़िराक़-ए-यार में वहशत कोई नहीं करता
शजर जो दिल-लगी करना ये सोचकर करना
यहाँ किसी से मुरव्वत कोई नहीं करता
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