duniya ki tarah apni zaroorat nahin badli | दुनिया की तरह अपनी ज़रूरत नहीं बदली

  - Shajar Abbas

दुनिया की तरह अपनी ज़रूरत नहीं बदली
कपड़ो की तरह हमने मुहब्बत नहीं बदली

बचपन से वफ़ादार थे हामी-ए-वफ़ा थे
बचपन की जवाँ हो के भी आदत नहीं बदली

हाकिम तो कई बदले मगर ज़ुल्म सितम की
अफ़सोस यहाँ कोई रिवायत नहीं बदली

बर्बाद वतन सारा ये कर डालेंगे हाकिम
अब उठ के अगर हमने हुकूमत नहीं बदली

तक़लीद सदा क़ैस की करते रहे हम सब
हमने कभी पुरखों की शरीयत नहीं बदली

  - Shajar Abbas

Shaheed Shayari

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