सुन के ये बात नच रहा हूँ मैं
साथ में तेरे जच रहा हूँ मैं
फूल ये ज़ख़्म गहरे देते हैं
इसलिए इन से बच रहा हूँ मैं
क़ल्ब-ए-मुज़्तर में इक हसीना के
बन के इक शोर मच रहा हूँ मैं
तेरे तोहफ़े के इन लिबासों को
ज़ेब-ए-तन कर के जच रहा हूँ मैं
इक ज़माना था उस ज़माने में
जान-ए-जाँ तेरा सच रहा हूँ मैं
मेरी शाख़ों पे आ गए हैं समर
इसलिए थोड़ा लच रहा हूँ मैं
ज़ेर-ए-पा दिल वो मेरा रौंद गई
अपने दिल को खुरच रहा हूँ मैं
उसके दस्त-ए-अदब पे देखो शजर
शक्ल-ए-मेहंदी में रच रहा हूँ मैं
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