sun ke ye baat nach raha hooñ main | सुन के ये बात नच रहा हूँ मैं

  - Shajar Abbas

सुन के ये बात नच रहा हूँ मैं
साथ में तेरे जच रहा हूँ मैं

फूल ये ज़ख़्म गहरे देते हैं
इसलिए इन से बच रहा हूँ मैं

क़ल्ब-ए-मुज़्तर में इक हसीना के
बन के इक शोर मच रहा हूँ मैं

तेरे तोहफ़े के इन लिबासों को
ज़ेब-ए-तन कर के जच रहा हूँ मैं

इक ज़माना था उस ज़माने में
जान-ए-जाँ तेरा सच रहा हूँ मैं

मेरी शाख़ों पे आ गए हैं समर
इसलिए थोड़ा लच रहा हूँ मैं

ज़ेर-ए-पा दिल वो मेरा रौंद गई
अपने दिल को खुरच रहा हूँ मैं

उसके दस्त-ए-अदब पे देखो शजर
शक्ल-ए-मेहंदी में रच रहा हूँ मैं

  - Shajar Abbas

Mahatma Gandhi Shayari

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