लहू में तर हुआ मंज़र तो दिल मलूल हुआ
उदास देखा समुंदर तो दिल मलूल हुआ
यज़ीद-ए-वक़्त की बैअत किए हुए ज़ाकिर
हुए जो ज़ीनत-ए-मिम्बर तो दिल मलूल हुआ
हमेशा बिस्तर-ए-मख़मल पे सोने वाले को
मिला जो ख़ाक का बिस्तर तो दिल मलूल हुआ
बहन के सामने भाई की ख़ुश्क गर्दन पर
चला जो दश्त में ख़ंजर तो दिल मलूल हुआ
सख़ी के घर से शजर ख़ाली हाथ जब घर को
पलटता देखा गदागर तो दिल मलूल हुआ
वो जिसके दम से मिरे घर में रौनक़ें थीं शजर
न आया घर को पलटकर तो दिल मलूल हुआ
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