तुम्हारी आँखों के मयकदे से अगरचे मैकश को मय मिलेगी
तो क़ल्ब-ए-दश्त-ए-जुनूँ की तिश्ना लबी बुझी तो ज़रा बुझेगी
तुलू-ए-महताब-ए-वस्ल होगा कभी उदासी के आसमाँ पर
कभी तो जज़्बात-ए-इश्क़ तुझको भी कू-ए-दिल में अमाँ मिलेगी
निगाह-ए-बिस्मिल से सू-ए-बज़्म-ए-नियाज़ देखेगी आज लैला
ख़िताब-ए-क़ुर्बत जनाब-ए-मजनूँ के जब लब-ए-ख़ंद से सुनेगी
सुकून-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं लबों की हँसी को हमराह लाएगी वो
दयार-ए-जान-ए-वफ़ा से सू-ए-शजर जो बाद-ए-सबा चलेगी
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