मेरे अपने ही शजर मुझपे सितम करते हैं
फिर सितम करके ग़ज़ब ग़म देखिए करते हैं
हम ही महरूम हैं बस नज़र-ए-करम से उनकी
बाक़ी हर शख़्स पे वो नज़र-ए-करम करते हैं
फ़र्श-ए-मजलिस पे ग़म-ए-हिज्र में मातम करके
रोज़-ओ-शब शाम-ओ-सहर आँखों को नम करते हैं
हज़रत-ए-दिल से जुदाई के मसाइब सुनकर
गिर्या हर वक़्त ये क़िर्तास-ओ-क़लम करते हैं
लीजिए आज शजर सुन के सदा-ए-दिल को
कूचा-ए-यार को हम बाग़-ए-इरम करते हैं
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