क़बीले के अपने वफ़ादार तुम हो
हो जनता की हामी या इनकार तुम हो
हक़ीक़त क़लम से निकलती नहीं है
ख़रीदा हुआ जैसे अख़बार तुम हो
दिखाओगे तुम तो धमक रंगदारी
है नेता सभी गुंडे सरकार तुम हो
दिखाकर के सपने जो काटी हैं ज़ेबें
गरीबों के कैसे मददगार तुम हो
ग़नीमत है हम बोल देते हैं वर्ना
भगत सब तुम्हारे निराकार तुम हो
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