हमारे हौसलों को पाँव देते हैं
पिता धूप ओढ़ते हैं छाँव देते हैं
तुम्हारे शहर में ये मसअला होगा
हमारे गाँव में सब छाँव देते हैं
ये दुनिया तो बना देती है घनचक्कर
जिनालय और शिवालय ठाँव देते हैं
इसी लालच से आँगन में जगह दे दो
बड़े बूढ़े घनेरी छाँव देते हैं
— Aatish Indori















