jitni dikhti hai utni hariyaali nahin hai | जितनी दिखती है उतनी हरियाली नहीं है

  - Aatish Indori

जितनी दिखती है उतनी हरियाली नहीं है
पिछड़ो की बस्ती तुमको दिखलाई नहीं है

सागर में है दरिया में गहराई नहीं है
बात ये झूटी है इस
में सच्चाई नहीं है

अदालतें माना रात को भी खुल जाती हैं
असली मुद्दों की लेकिन सुनवाई नहीं है

जिनको लूटा गया है उन सेे जाकर पूछो
इतिहास की किताबों में सच्चाई नहीं है

इक दो क़ौमों के वोटों से ही जीते हो
तुमने बहुमत से सरकार बनाई नहीं है

  - Aatish Indori

More by Aatish Indori

As you were reading Shayari by Aatish Indori

Similar Writers

our suggestion based on Aatish Indori

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari