कोशिश तो की लेकिन भुला नहीं पाए
एक यही वा'दा हम निभा नहीं पाए
धरती बंजर नहीं थी हम ही बंजर थे
दूजा कोई रिश्ता उगा नहीं पाए
पाई हमने भी थी मुहब्बत की दौलत
हम सोना चाँदी पर पचा नहीं पाए
बाद में सबको इसका मलाल होता है
माता-पिता का क़र्ज़ा चुका नहीं पाए
क्या करता वो तो चारागर भी निकला
पीड़ा अपनी उस सेे छुपा नहीं पाए
As you were reading Shayari by Aatish Indori
our suggestion based on Aatish Indori
As you were reading undefined Shayari