hazrat-e-qais khitaabat ke li.e aayenge | हज़रत-ए-क़ैस ख़िताबत के लिए आऍंगे

  - Afzal Sultanpuri

हज़रत-ए-क़ैस ख़िताबत के लिए आऍंगे
हम तिरे शहर मोहब्बत के लिए आऍंगे

हम तो रोएँगे इसी सोच में पागल होकर
हाल पूछेंगे तबीयत के लिए आऍंगे

रक़्स करते थे तुम्हें पा के मगर क्या हासिल
क्या ख़बर आप नसीहत के लिए आऍंगे

लौट आए भी अगर आप हमारी जानिब
हाँ फ़क़त अपनी ज़रूरत के लिए आऍंगे

ज़ुल्म के आप तरफ़दार नज़र आते हैं
आप आएँगे हुकूमत के लिए आऍंगे

जिस तरह चाल चली आपने हम पर ज़ालिम
साफ़ लगता है शिकायत के लिए आऍंगे

तेरी चौखट पे कभी आ भी गए याद रहे
बस दुआ और इबादत के लिए आऍंगे

बाद मरने के भी ग़ुस्सा है वो मुझ सेे 'अफ़ज़ल'
हमने बोला था ज़ियारत के लिए आऍंगे

  - Afzal Sultanpuri

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