तुम्हारे प्यार के क़ाबिल नहीं हूँ
किनारा हूँ मगर साहिल नहीं हूँ
उठा सकता था मैं तलवार लेकिन
ज़माने की तरह ज़ाहिल नहीं हूँ
क़बाइल जल गया मैं भाग आया
मगर अए यार मैं बुज़दिल नहीं हूँ
जनाज़े की क़सम सच कह रहा हूँ
नहीं इस जुर्म में शामिल नहीं हूँ
मुझे बदनाम करने में लगे हैं
मैं अपने यार का क़ातिल नहीं हूँ
मुझे अब छोड़कर अफ़ज़ल चला जा
सफ़र का मैं तिरे मंज़िल नहीं हूँ
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