देख लो फिर से कुछ रहा तो नहीं ?

तुम में अंदर मैं और बचा तो नहीं ?

मेरे ज़िंदान में बसे हुए शख़्स
मुझ को बतला कि मैं बुरा तो नहीं ?

अपनी क़ामत से ऊँचा है शब्बीर
गिर गया कट के पर झुका तो नहीं ?

सोचता हूँ कि दहर-ए-फ़ानी में
तेरी फ़ुर्क़त मिरी सज़ा तो नहीं ?

— Faiz Ahmad

More by Faiz Ahmad

Other ghazal from the same pen

See all from Faiz Ahmad →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling