वक़्त आने पे सब को बता देंगे हम

आम के पेड़ सा फ़ाएदा देंगे हम

हम हैं वो लोग जो जॉन को पढ़ते थे
ज़िंदगी तुम पर अपनी लुटा देंगे हम

हक़ नहीं है चराग़ों पे माना मगर
आग तेरे बदन की बुझा देंगे हम

कौन सीखा सिखाने पे जीना यहाॅं
सब यही कह रहे थे सिखा देंगे हम

गालियाँ देनी है बे झिझक दीजिए
ख़ुश रहो ये हमेशा दुआ देंगे हम

ज़ुल्फ़ से खेलना चाहता हूँ अभी
बा'द में ख़ुद रबर को लगा देंगे हम

है वो आज़ाद पंछी उसे इल्म है
उड़ने का जब कहेगा उड़ा देंगे हम

मैं कभी आप के दिल से निकला नहीं
लोग तो कह रहे थे जगह देंगे हम

— Akshay Sopori

More by Akshay Sopori

Other ghazal from the same pen

See all from Akshay Sopori →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling