ये चाँद जो हसीन रात में निकल नहीं रहा
तो क्या ये उसके साथ करवटें बदल नहीं रहा
वो जिस्म आग है मगर ये सोचने की बात है
मैं छू के आ रहा हूँ मेरा जिस्म जल नहीं रहा
मेरी नज़र को ऐसे ख़्वाब दे कि जिस
में वो न हो
मुझे वो दिल दिखा जहाँ वो ख़्वाब पल नहीं रहा
अजीब दोस्त है जो दस बजे के बाद फोन पर
बुला रहा है और मेरे साथ चल नहीं रहा
इक ऐसा एक्सपेरि
मेंट है महाज़-ए-इश्क़ जो
बहुत किया गया मगर कभी सफल नहीं रहा
कोई बदन नहीं कि जिसके 'इश्क़ में हवस न हो
कोई जगह नहीं जहाँ ये खेल चल नहीं रहा
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