कहते थे जो रखा ही है क्या प्यार इश्क़ में
हाथों में थामे फिरते हैं तलवार इश्क़ में
पत्थर हमारी अक़्ल पे भी पड़ गए हुज़ूर
हम भी हुए किसी के गिरफ़्तार इश्क़ में
तुझको न हो यक़ीं तो ज़माने में ढूँढ ले
मिलता नहीं है कोई वफ़ादार इश्क़ में
होता है आशिक़ी का जुनूँ सर पे भी सवार
बढ़ती है धड़कनों की भी रफ़्तार इश्क़ में
दुनिया के मशवरों पे न जा दिल की बात सुन
दिल के सिवा न कोई तरफ़-दार इश्क़ में
भूले ख़ुदा को छोड़ के तस्बीह शैख़ जी
वो भी हुए हैं हुस्न के बीमार इश्क़ में
आशिक़ है गर तो सीख रिवायत भी इश्क़ की
सर को पटक के रो पस-ए- दीवार इश्क़ में
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