यूँँ तुम्हारे हुस्न की मैने वज़ाहत की
सब जहाँ को छोड़ के तुम से मुहब्बत की
मिल ही जाएँगी मुझे भी घड़ियाँ राहत की
इक नज़र हो जाएगी जब तेरी रहमत की
तू तो उस शिद्दत से नफ़रत भी न कर पाई
मैने जिस दरजा सनम तुझ सेे मुहब्बत की
ढंग का इन्सान तक यारों नहीं है वो
मान के मैने ख़ुदा जिसकी इबादत की
छोड़ना मुमकिन तो है लेकिन नहीं आसाँ
बात यह चाहत की कम है ज़्यादा आदत की
है मोहब्बत में ही मुमकिन मोजिज़ा यह तो
जिसके दिल में मैं था उसने दिल से हिजरत की
सब के सब वाइज़ हुए तबदील रिंदों में
तुम ने जिस भी शहर में जस्सर सुकूनत की
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