यूँँ तुम्हारे हुस्न की मैं ने वज़ाहत की
सब जहाँ को छोड़ के तुम से मुहब्बत की
मिल ही जाएँगी मुझे भी घड़ियाँ राहत की
इक नज़र हो जाएगी जब तेरी रहमत की
तू तो उस शिद्दत से नफ़रत भी न कर पाई
मैं ने जिस दरजा सनम तुझ से मुहब्बत की
ढंग का इंसान तक यारों नहीं है वो
मान के मैं ने ख़ुदा जिस की इबादत की
छोड़ना मुमकिन तो है लेकिन नहीं आसाँ
बात ये चाहत की कम है ज़्यादा आदत की
है मोहब्बत में ही मुमकिन मो'जिज़ा ये तो
जिस के दिल में मैं था उस ने दिल से हिजरत की
सब के सब वाइज़ हुए तबदील रिंदों में
तुम ने जिस भी शहर में जस्सर सुकूनत की
— Avtar Singh Jasser















