har ik dar pe hi sajda kyun karein ham | हर इक दर पे ही सजदा क्यों करें हम

  - Avtar Singh Jasser

हर इक दर पे ही सजदा क्यों करें हम
कि अपने सर को सस्ता क्यों करें हम

न बन पाये जो हिस्सा ज़िंदगी का
उसे फिर दिल का हिस्सा क्यों करें हम

जहाँ अहल ए ज़बान ए ख़ामोशी हों
वहाँ लफ़्ज़ों को ज़ाया क्यों करें हम

हक़ीक़त में नहीं अपना हुआ जो
उसे ख़्वाबों में अपना क्यों करें हम

सज़ा जिसकी अभी तक मिल रही है
वही ग़लती दोबारा क्यों करें हम

हमारे पास माचिस ही नहीं है
तो सूखे बर्ग़ यकजा क्यों करें हम

फ़क़त इक दोस्त की ख़ातिर ऐ 'जस्सर'
अदू सारा ज़माना क्यों करें हम

  - Avtar Singh Jasser

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