हर इक दर पे ही सजदा क्यूँ करें हम

कि अपने सर को सस्ता क्यूँ करें हम

न बन पाए जो हिस्सा ज़िंदगी का
उसे फिर दिल का हिस्सा क्यूँ करें हम

जहाँ अहल ए ज़बान ए ख़ामोशी हों
वहाँ लफ़्ज़ों को ज़ाया' क्यूँ करें हम

हक़ीक़त में नहीं अपना हुआ जो
उसे ख़्वाबों में अपना क्यूँ करें हम

सज़ा जिस की अभी तक मिल रही है
वही ग़लती दोबारा क्यूँ करें हम

हमारे पास माचिस ही नहीं है
तो सूखे बर्ग़ यकजा क्यूँ करें हम

फ़क़त इक दोस्त की ख़ातिर ऐ 'जस्सर'
अदू सारा ज़माना क्यूँ करें हम

— Avtar Singh Jasser

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