जिस रस्ते से मुझ को जाना पड़ता है
उस रस्ते पे इक मयख़ाना पड़ता है
कब मिलता है रस्म-ए-दीन निभा कर ख़ुल्द
इस की ख़ातिर तो मर जाना पड़ता है
ख़ुद ही ख़ुद को याद दिलाता हूँ तेरी
फिर ख़ुद ही ख़ुद को समझाना पड़ता है
उन को ख़ुद से दूर न जाने देना तुम
उनकी ख़ातिर फिर पछताना पड़ता है
जब भी तेरी याद सताती है जस्सर
दिल को बातों में उलझाना पड़ता है
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