इश्क़ में हद से गुज़र जाते हैं लोग
ख़ुद-कुशी करते हैं मर जाते हैं लोग
क्या यक़ीं कोई करे यारो किसी का
अपने वादों से मुकर जाते हैं लोग
हम बहार ए ग़म में खिलते हैं मगर
ऐसे मौसम में बिखर जाते हैं लोग
ठोकरें खा खा के बिगड़े हम मगर
ठोकरें खा के सुधर जाते हैं लोग
बस उसी जानिब न 'जस्सर' हम गए
कारवाँ ले कर जिधर जाते हैं लोग
— Avtar Singh Jasser















