तुम्हारी याद दीमक हो गई है
कि बर्बादी की दस्तक हो गई है
हुआ जाता है दिल मजरूह मेरा
तेरी हर बात नावक हो गई है
हर इक इंसान इस पे चल रहा है
बुराई एक मस्लक हो गई है
मैं हरगिज़ कह नहीं पाऊँगा उस से
मोहब्बत मुझ को बेशक हो गई है
बिकेगा इश्क़ 'जस्सर' कौड़ियों में
कि दुनिया इस की गाहक हो गई है
— Avtar Singh Jasser















