इक लम्हे में कई ज़माने लगते हैं
जब हम पहला प्यार भुलाने लगते हैं
हम को अपनी जाँ का ख़तरा होता है
जब हम तेरी क़सम उठाने लगते हैं
ग़ैर-मिजाज़ नहीं है इश्क़ मगर फिर भी
हम पे हर दिन सौ हर्जाने लगते हैं
उस की आँखें नज़्म सुनाने लगती हैं
जब हम उस को ग़ज़ल सुनाने लगते हैं
आँखों से नींदें उड़ जाती हैं 'जस्सर'
जब हम कोई ख़्वाब सजाने लगते हैं
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