Meaning of

क़लन्दर

qalandar • قلندر

सूफी संत; भटकता फकीर

mystic; wandering dervish

صوفی سنت; بھٹکتا فقیر

Persian

हम क़लंदर-मिज़ाज हैं 'ज़ामी' हम कनाअत-शिआर होते हैं — Parvez Zaami
गर क़लंदर है तो फिर अवसर बना आसमाँ को छत ज़मीं को घर बना — Ajeetendra Aazi Tamaam
सियासतों ना क़लंदरों के ना माल-ओ-ज़र या सिंगार आगे झुकेगा सर अपना सिर्फ़ रोज़ी या दीद-ए-परवर-दिगार आगे — Aarush Sarkaar
दुनिया-ए-सुख़न का मैं क़लन्दर नहीं होता गर पेशे नज़र मीर का दफ्तर नहीं होता — Khalid Lakhnavi
ख़ुद ही अपना ध्यान रखना है मुझे इश्क़ में मैं भी क़लंदर था कभी — Sibgatullah Anwer

'क़लन्दर' शब्द एक मुक्त-आत्मा सूफी संत की छवि को उभारता है, जो भौतिक चिंताओं से मुक्त होकर दुनिया में घूमता है। कविता में, यह एक ऐसी आत्मा का प्रतीक है जो दिव्य सत्य की खोज में है, सांसारिक बंधनों से मुक्त।

कवि अक्सर 'क़लन्दर' का आह्वान आध्यात्मिक स्वतंत्रता और पारलौकिकता के विषयों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह भौतिक दुनिया के विपरीत है, ज्ञान और आंतरिक शांति की यात्रा को उजागर करता है।

'क़लन्दर' सत्य की अनंत खोज को मूर्त रूप देता है, आत्मा की सांसारिकता से परे यात्रा की याद दिलाता है।