हमारी फ़िक्र में नाहक़ न सुब्ह-ओ-शाम करो
तुम अपनी राह लगो जाओ अपना काम करो
ज़बाँ तराश लो चाहे असीर-ए-दाम करो
तुम्हें ये हक़ है जहाँ चाहे क़त्ल-ए-आम करो
जब उनका ज़िक्र फ़साने में आया कहने लगे
चलो हटाओ ये क़िस्सा यहीं तमाम करो
न इसपे जाओ कि आई ख़िज़ाँ बनाम-ए-बहार
ये हुक्म है कि बहारों का एहतिराम करो
वो क़ब्र जिस
में मुक़य्यद है बे-कसी की सदा
'सबा' तुम उसको गिराने का इंतिज़ाम करो
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