divya 'sabaa'

divya 'sabaa'

@divya.behindthelense

divya 'sabaa' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in divya 'sabaa''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कहाँ के सजदा-ए-क़िरअत कहाँ का ध्यान और पूजा इबादत-गाह भी अब हम बराए शर बनाते हैं — divya 'sabaa'
राह में हर पल भटक जाने का डर बाक़ी रहे या'नी मंजिल पर पहुँच कर भी सफ़र बाक़ी रहे — divya 'sabaa'
वो अक्स जिस की एक भी मुमकिन नहीं मिसाल जो बन के मेरे ज़ेहन में पैकर ठहर गया — divya 'sabaa'
यूँँ तो तमाम रंग थे तस्वीर में मिरी लेकिन सियाह रंग ने बेहतर किया मुझे — divya 'sabaa'
उदासी के घने साए मिटाकर ही वो मानेंगे जो तन्हा अपने कमरे में ठहाकों को लगाते हैं — divya 'sabaa'
अगर मासूमियत से काम लेना चाहते हो पढ़ो छू कर गुलों को तुम कि उन पर क्या लिखा है — divya 'sabaa'
हयात-ओ-मौत में कुछ फ़ासिला यक़ीनी है मगर चलें तो सफ़र ख़त्म और शुमार न हो — divya 'sabaa'
दयार-ए-हिज्र की तन्हा उदास रातों में रवाँ-दवाँ तिरी आवाज़-ए-पा अभी तक है — divya 'sabaa'
चंद मख़्सूस दरख़्तों से मुहब्बत का जुनून कुछ परिंदों को कहीं का नहीं रहने देता — divya 'sabaa'
ताज़ा फूलों से नहीं घर की शिनाख़्त फूल मुरझाएँ तो अपना घर लगे — divya 'sabaa'
हम तो मेमार हैं कर लेंगे नशेमन तामीर हाँ मगर ठहरो ये तूफ़ान गुज़र जाने दो — divya 'sabaa'
सुना है 'मीर' को पढ़ने लगा है वो जब से बहुत उदास सा रहता है बोलता भी नहीं — divya 'sabaa'
हमारा क़त्ल पहेली है एक इक के लिए किसी को क्या है ख़बर हम ने ख़ुद-कुशी की है — divya 'sabaa'
ये मिरी ग़ज़ल का मिज़ाज है कि वो क़ाफ़िए के ख़िलाफ़ है कभी रक़्स करती है अक्स पर अभी आईने के ख़िलाफ़ है — divya 'sabaa'
मैं हूँ और कुंज-ए-क़फ़स है मिरी राहत के लिए सभी सामान बहम है मिरी इशरत के लिए — divya 'sabaa'
मरज़ अजीब था अपना अजब मसीहा थे दवा ने मुझ पे दवा पर शिफ़ा ने तंज़ किया — divya 'sabaa'
आशिक़ों का यही अफ़साना है और कुछ भी नहीं कुछ न कर पाएँ तो वो आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे — divya 'sabaa'
कुछ ख़तरा नहीं उन को समुंदर की तरफ़ से हुशयार अब आईने हैं पत्थर की तरफ़ से — divya 'sabaa'
हम ने ग़ज़ल में उस के सिवा सब सेे बात की अब इस को आप कुछ भी कहें इस्तिलाह में — divya 'sabaa'

Ghazal

न बने मुझ सेे भी माक़ूल जवाबात कभी न गए उस की नज़र से भी सवालात कभी मुझ को किस शय की तलब है मैं बता भी न सकी और क़िस्मत ने भी समझी न मिरी बात कभी नींद में भी निकल आते हैं अचानक आँसू जाग जाते हैं अगर ख़्वाब में जज़्बात कभी कुछ तो है दिल को जो बेचैन किए जाता है इस तरह दर्द में कटते न थे दिन-रात कभी जिस पे आ कर दिल-ए-मुज़्तर को क़रार आ जाए हिजरतों में नहीं आते वो मुक़ामात कभी कैसे बनती मैं भला अहल-ए-जहाँ के जैसी उस के मेआ'र पे उतरी न मिरी ज़ात कभी बज़्म-ए-अग़्यार में जाने का मुझे शौक़ नहीं और मिलते नहीं अपनों से ख़यालात कभी अपने बारे में बताऊँ भी तो कैसे कि 'सबा' ख़ुद से होती ही नहीं मेरी मुलाक़ात कभी — divya 'sabaa'
उस ने कहा ख़याल-ए-वस्ल मैं ने कहा कि ख़्वाब है उस ने कहा फ़रोग़-ए-हुस्न मैं ने कहा हिजाब है उस ने कहा ख़बर नहीं क्यूँ तुझे काइ‌नात की मैं ने कहा शबाब की कैफ़ियत-ए-शबाब है उस ने कहा सुकूँ नहीं ग़म की सियाह रात में मैं ने कहा कि फ़िक्र क्या जाम है और शराब है उस ने कहा कि बात मान चेहरे को बेनक़ाब कर मैं ने कहा कि ज़िद न कर दीद की तुझ को ताब है उस ने कहा कि ख़्वाब में देखें हैं गेसू-ए-हसीं मैं ने कहा कि ज़िंदगी अब तिरी पेच-ओ-ताब है उस ने कहा ख़राब हूँ गर्दिश-ए-चश्म-ए-मस्त से मैं ने कहा कि रक़्स कर सारा जहाँ ख़राब है उस ने कहा सबात भी है किसी शय को दहर में मैं ने कहा कि पाएदार गुलशन-ए-बू-तुराब है उस ने कहा 'सबा' ये सब राज़-ओ-नवाज़ ख़ूब है मैं ने कहा 'सबा' ये तो इश्क़ ही कामियाब है — divya 'sabaa'
निकले जो कल क़रीब से उन के मकाँ के हम शाइ'र शुमार हो गए उर्दू ज़बाँ के हम डरते रहे जो ज़िक्र से दर्द-ओ-निहाँ के हम क़िस्से सुना गए उन्हें सारे जहाँ के हम हर शख़्स के रफ़ीक़ हों हर दिल में हों अज़ीज़ कहिए कि पुर-हसीन हैं ऐसे कहाँ के हम कोई फ़क़ीर समझा कोई नीम-जाँ मरीज़ रहमत की भीख माँगा किए दिल-गवाँ के हम आसाइशें जहान की क़दमों में हैं मगर आलाम उठा रहे हैं दिल-ए-नातवाँ के हम जन्नत में हाथों-हाथ लिए जाएँगे हमीं हैं बादशाह आप यहाँ के वहाँ के हम दिल में तो उन के और किसी का गुज़र नहीं मालिक बिला शरीक़ हैं सारे मकाँ के हम अपना ज़मीर पाक किसी से गिला नहीं अब तो हैं राह-ए-इश्क़ में हर कारवाँ के हम — divya 'sabaa'
आज दुनिया में क्या नहीं होता एतिराफ़-ए-ख़ता नहीं होता दर्द अगर ला-दवा नहीं होता ज़िंदगी में मज़ा नहीं होता लाख ईसार कीजिए लेकिन इश्क़ का हक़ अदा नहीं होता ख़ूब करते हैं वो गिले-शिकवे जिन को पास-ए-वफ़ा नहीं होता जो तुम्हारी तलाश करता है उस को ख़ुद का पता नहीं होता फ़ैज़ है ये तो तेरी निस्बत का पस्त जो हौसला नहीं होता जब बदलती हैं वक़्त की आँखें आश्ना आश्ना नहीं होता काश मिज़राब-ए-चश्म से छेड़ो साज़-ए-दिल बे-सदा नहीं होता कितने आलम समाए रखता है दिल की दुनिया में क्या नहीं होता क्यूँँ 'सबा' ए'तिबार है तुम को ना-ख़ुदा तो ख़ुदा नहीं होता — divya 'sabaa'
दवा को ज़हर समझे हर दुआ को बद-दुआ समझे रखें क्या हौसला वो ख़ुद को जो बे-दस्त-ओ-पा समझे अमल अपने न देखे मुझ को बर्बाद-ए-अना समझे तजाहुल है तग़ाफ़ुल है सबा समझे तो क्या समझे बहुत आसान है महफ़िल में हर मिसरे को दोहराना तह-ए-मफ़हूम पहुँचे जो फ़न-ए-हर्फ़-ओ-सदा समझे वो बरसों में वतन लौटा तो हर चेहरा था पत्थर का है मुश्किल में किसे वो आश्ना ना-आश्ना समझे न रौशन आँख की तोहमत लगा वीराँ दरीचे पर न ये हुस्न-ए-शफ़क़ देखे न ये रंग-ए-हिना समझे कभी है बर्क़-ओ-बाराँ और कभी चहकी हुई ख़ुश्बू तिरे कूचे की फिर कैसे कोई आब-ओ-हवा समझे नई तहज़ीब लाई है बनाम-ए-इश्क़ उर्यानी न ये हुरमत मुहब्बत की न नामूस-ए-वफ़ा समझे बसारत और समा'अत में अजब तफ़रीक़ है यारो कहे शो'ला सबा और कोई क़िन्दील-ए-नवा समझे — divya 'sabaa'
थे ख़ास या कि आम मुझे देखते रहे छोटे बड़े तमाम मुझे देखते रहे रिंदान-ए-मयकदे को ख़ुदा जाने क्या हुआ रख कर ज़मीं पे जाम मुझे देखते रहे इस कारवान-ए-शौक़ के रहबर कमाल थे रुक रुक के गाम गाम मुझे देखते रहे बाम-ए-फ़लक पे हाल फ़रिश्तों का था अजब कर के दुआ सलाम मुझे देखते रहे मैं काफ़िर-ए-अज़ल थी मगर फिर भी अहल-ए-दीं ले कर ख़ुदा का नाम मुझे देखते रहे मंदिर में हर सनम की नज़र थी तो मुझ पे थी मस्जिद में भी इमाम मुझे देखते रहे सैयाद दम-ब-ख़ुद थे मिरे हाल-ए-ज़ार पर झुक झुक के ज़ेर-ए-दाम मुझे देखते रहे कल शब न जाने कौन मुझे ले गया कहाँ ख़ूबाँ-ए-लाला-फ़ाम मुझे देखते रहे दिन भर जो मुझ से आँख चुराते रहे 'सबा' जी भर के सारी शाम मुझे देखते रहे — divya 'sabaa'
बताएँ तुम्हें क्या कि क्या हो रहा है नए सर से सजदा अदा हो रहा है मिरा रंज-ओ-ग़म सब हवा हो रहा है किसी से क़रार-ए-वफ़ा हो रहा है क़रार आ गया क्यूँ ये बे-ताब दिल को कहीं कोई वादा-वफ़ा हो रहा है उन्हें आज क्या मेरी याद आ रही है ये क्यूँ दर्द दिल में सिवा हो रहा है वफ़ा मेरी क्या थी जफ़ा गर न होती बुरा कह रहे हैं भला हो रहा है मेरी ज़िंदगी में तग़य्युर ये कैसा नया रास्ता एक वा हो रहा है सलामत रहे मेरा दिल लेने वाला मुझे इक नया दिल अता हो रहा है वो कुछ इस तरह से मुझे देखता है कि जैसे मेरा रहनुमा हो रहा है मैं यूँँ आ रही हूँ निगाहों में उन की कि गोया कोई हक़ अदा हो रहा है दिखाएगा अब कौन उल्फ़त की राहें कि गुल ये चराग़-ए-वफ़ा हो रहा है मिरा दर जो इनको नज़र आ गया है कि हर शख़्स आ के फ़ना हो रहा है — divya 'sabaa'
मैं ने भी नज़रें झुका लीं उस ने भी पर्दा किया फिर भी जाने क्यूँँ ज़माने ने हमें रुसवा किया आते जाते मेरा उन सेे हो गया जब सामना दिल बहुत ज़ोरों से धड़का हाथ से थामा किया अक़्ल ने रोका बहुत लेकिन ये दिल माना नहीं हम ने फिर उन सेे किसी इतवार का वा'दा किया ग़ैर से हो क्या गिला अपनों ने आँखें फेर लीं सोचते ही रह गए ऐसा भी हम ने क्या किया चलते कितनी दूर तक मंदिर में माथा टेकने घर से मस्जिद पास थी हम ने वहीं सजदा किया मज़हब इक ऐसा भी हो जो आदमियत ही सिखाए पढ़ के पंडित मौलवी मुल्ला बने तो क्या किया जो भी करना था सबा करते रहे हम बे-झिझक नुक्ता-चीं कहते रहे ऐसा किया वैसा किया — divya 'sabaa'
है शहर में मिरे भी इक ऐसा हरीफ़-ए-जाँ कुछ जानता नहीं है मगर है अरूज़-दाँ आजिज़ हैं लोग उस के ज़बान-ओ-बयान से अहल-ए-ज़बान कहते हैं सब उस को बद-ज़बाँ क़दमों तले ज़मीन नहीं एक इंच भी फिर भी उठाए फिरता है सर पर वो आसमाँ ग़ज़लें किसी को हों कभी भाती नहीं उसे अपने हर एक शे'र को कहता है जाविदाँ इस की मुख़ालिफ़त कभी उस की मुख़ालिफ़त हैं लोग उस से और वो लोगों से बद-गुमाँ ख़ामी तलाश करता है सबके कलाम में मुँह मारता ही रहता है हरदम यहाँ वहाँ जो कह रहा है समझो उसे हर्फ़-ए-आख़िरी महफूज़ है वो शख़्स जो करता है हाँ में हाँ — divya 'sabaa'
इसे भी शूमी-ए-क़िस्मत का सिलसिला सोचूँ ज़बाँ पे लफ़्ज़ न आए अगर दुआ सोचूँ सभी शिकायत-ओ-शिकवे वफ़ात पा जाएँ ख़ुद अपनी ज़ात को जब तेरा आइना सोचूँ लहू उगलते हुए ज़ख़्म भी हसीन लगें मिरी ये शोख़ हथेली पे जब हिना सोचूँ तिरा करम है जो बख़्शा शुऊर-ए-ग़म मुझ को न अब इलाज की चाहत न अब दवा सोचूँ इसे हिसार करे दायरा फ़सादों का बराय-ए-अम्न अगर कोई ज़ाविया सोचूँ मिरी ही दीदा-वरी ख़ुद हरीफ़ है मेरी मिरे ही ऐब खुलें जब कोई क़बा सोचूँ अमल का रद्द-ए-अमल है मिज़ाज में मेरे मिरी ख़ुदी हो जवाँ जब तिरी अना सोचूँ फ़रेब इतने मिले मुझ को इस जहाँ से 'सबा' वफ़ा-परस्त मिले भी तो बे-वफ़ा सोचूँ — divya 'sabaa'
ये इल्तिमास है परवर-दिगार अब के बरस ज़मीन-ए-दर्द पे ख़ुशियाँ उतार अब के बरस सुलग रहा है ये सहरा-ए-ज़िंदगी कब से फ़लक से फूटे करम की फुवार अब के बरस मुझे यक़ीन है एहसास के गुलिस्ताँ में महकती आएगी फ़स्ल-ए-बहार अब के बरस दुआ को हाथ उठाओ मसर्रतें माँगो कि छटने वाला है ग़म का ग़ुबार अब के बरस सदा ये बढ़ के रहे और सभी से बढ़ के रहे ग़रीब पर निगह-ए-किर्दगार अब के बरस ख़ुलूस प्यार उख़ुव्वत का दौर-दौरा हो किसी के दिल में न हो इंतिशार अब के बरस सबा नज़र में हैं उम्मीद के दिए अब जो कि रंग लाए मिरा इंतिज़ार अब के बरस — divya 'sabaa'

Nazm

"रात की बोझिल उदासी" रात की बोझिल उदासी और याद-ए-रफ़्तगाँ बुझ रहे हैं चाँद-तारे जल रहे हैं जिस्म-ओ-जाँ बहर-ओ-बर पर छा रहा है नम अँधेरों का धुआँ सीना-ए-दरिया पहाड़ों के नगर सोए हुए दश्त के पहलू में दीवानों के घर सोए हुए साया-ए-ज़ुल्मत तले उजड़े बशर सोए हुए खो गई तारीकियों में सोच की गहराइयाँ ज़ेहन-ओ-दिल को घेरती हैं यास की परछाइयाँ जाने किस दुनिया में जा कर बस गई रानाइयाँ ज़िंदगी का मान किस ने रख दिया बज़्म-ए-चमन ज़िंदगी तो है किसी बदबख़्त राही की थकन आरज़ूओं की समाधी सर्द सीने की घुटन हो चला है दिल मेरा ना-आश्ना-ए-रंग-ओ-नूर हो गया है आज वो दुनिया की हर राहत से दूर फ़िक्र के ज़िंदाँ में लेकिन सर पटकता है शऊर चीख़ती है रूह मेरी आज भी मुझ से परे जैसे मीलों दूर जंगल से कोई आवाज़ दे जैसे बूढ़ा साँप हो बेताब उड़ने के लिए — divya 'sabaa'