मेरी तक़दीर ने देखे ग़म-ओ-आलाम बहुत

तेरा एहसान है ऐ गर्दिश-ए-अय्याम बहुत

मैं जो उठ जाऊँगी महफ़िल से तेरी ऐ साक़ी
सीना-ज़न होंगे सुबू रोएँगे ये जाम बहुत

मैं इसी शाम को हमरंग-ए-सहर कर लूँगी
वक़्त-ए-नव के लिए मुझ को है यही शाम बहुत

बात जो मुझ में है वो और किसी में भी नहीं
गरचे इस शहर में हैं मूरिद-ए-इल्ज़ाम बहुत

अपने कूचे से वो बाहर तो निकलकर देखे
मसअले आ के ठहरते हैं सर-ए-बाम बहुत

अपने इख़लास-ओ-मुरव्वत की बदौलत अब भी
ऐ 'सबा' आप ज़माने में हैं बदनाम बहुत

— divya 'sabaa'

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