ज़िन्दगी तक रसाई भी क्या है

क़ैद क्या थी रिहाई भी क्या है

आन रक्खी है हम ने रिश्तों की
वरना अपनी कमाई भी क्या है

जिस के उठने से उठ गए फ़ितने
बात तू ने उठाई भी क्या है

सिलसिला ख़त्म है जो बाद-ए-मर्ग
तो क़ज़ा की दुहाई भी क्या है

बादा-नोशी गुनाह है लेकिन
आजकल पारसाई भी क्या है

भूल जाती हूँ ग़म ज़माने के
मय-कशी में बुराई भी क्या है

पर्दा-पोशी है जान की दुश्मन
मेरी जल्वा-नुमाई भी क्या है

ख़ुद-परस्ती अगर नहीं अच्छी
तो सबा ख़ुद-नुमाई भी क्या है

— divya 'sabaa'

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