जैसे जैसे फ़ासले दोनों में कम होने लगे
ज़िंदगी खिलने लगी दामन भी नम होने लगे
दिलकशी रा'नाई सरमस्ती धनक के रंग भी
आशिक़ी के फ़ैज़ से आपस में ज़म होने लगे
मेरी हैरत आईनों में भी नज़र आने लगी
महफिलों में तज़करे जिसके बहम होने लगे
अब तो मज़लूमों से हमदर्दी भी जैसे उठ गई
वाक़ियात ईसार-ओ-क़ुर्बानी के कम होने लगे
हम तो अब तहज़ीब के आदाब से वाक़िफ़ नहीं
ज़ावियों में अब निगाहों के भी ख़म होने लगे
हम सफ़र होता है मंज़िल तक 'सबा' ये ग़म है वो
रफ़्ता-रफ़्ता हम भी यूँँ मानूस-ए-ग़म होने लगे
Read Full