शगूफ़े ख़ूब खिले अबकी बार यादों के

हरे भरे ही रहे शाख़-सार यादों के

ठहर ठहर के उतरते हैं वादी-ए-दिल में
परिंदे शाम ढले बे-शुमार यादों के

खिली हुई है जो तन्हाइयों की धूप तो क्या
हैं रहगुज़र में अभी शाख़-सार यादों के

तमाम उम्र रही हूँ असीर माज़ी की
कि मेरे चारों तरफ़ थे हिसार यादों के

दयार-ए-शब की गुज़र गाह में पड़ी हूँ अभी
पड़ाव डाले हुए सद हज़ार यादों के

जला के राख करेंगे 'सबा' कभी मुझ को
सुलग रहे हैं जो दिल में शरार यादों के

— divya 'sabaa'

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