शगूफ़े ख़ूब खिले अबकी बार यादों के
हरे भरे ही रहे शाख़-सार यादों के
ठहर ठहर के उतरते हैं वादी-ए-दिल में
परिंदे शाम ढले बे-शुमार यादों के
खिली हुई है जो तन्हाइयों की धूप तो क्या
हैं रहगुज़र में अभी शाख़-सार यादों के
तमाम 'उम्र रही हूँ असीर माज़ी की
कि मेरे चारों तरफ़ थे हिसार यादों के
दयार-ए-शब की गुज़र गाह में पड़ी हूँ अभी
पड़ाव डाले हुए सद हज़ार यादों के
जला के राख करेंगे 'सबा' कभी मुझ को
सुलग रहे हैं जो दिल में शरार यादों के
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