ये इल्तिमास है परवर-दिगार अब के बरस

ज़मीन-ए-दर्द पे ख़ुशियाँ उतार अब के बरस

सुलग रहा है ये सहरा-ए-ज़िंदगी कब से
फ़लक से फूटे करम की फुवार अब के बरस

मुझे यक़ीन है एहसास के गुलिस्ताँ में
महकती आएगी फ़स्ल-ए-बहार अब के बरस

दुआ को हाथ उठाओ मसर्रतें माँगो
कि छटने वाला है ग़म का ग़ुबार अब के बरस

सदा ये बढ़ के रहे और सभी से बढ़ के रहे
ग़रीब पर निगह-ए-किर्दगार अब के बरस

ख़ुलूस प्यार उख़ुव्वत का दौर-दौरा हो
किसी के दिल में न हो इंतिशार अब के बरस

सबा नज़र में हैं उम्मीद के दिए अब जो
कि रंग लाए मिरा इंतिज़ार अब के बरस

— divya 'sabaa'

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