उसने कहा ख़याल-ए-वस्ल मैंने कहा कि ख़्वाब है
उसने कहा फ़रोग़-ए-हुस्न मैंने कहा हिजाब है
उसने कहा ख़बर नहीं क्यूँ तुझे कायनात की
मैंने कहा शबाब की कैफ़ियत-ए-शबाब है
उसने कहा सुकूँ नहीं ग़म की सियाह रात में
मैंने कहा कि फ़िक्र क्या जाम है और शराब है
उसने कहा कि बात मान चेहरे को बेनक़ाब कर
मैंने कहा कि ज़िद न कर दीद की तुझको ताब है
उसने कहा कि ख़्वाब में देखें हैं गेसू-ए-हसीं
मैंने कहा कि ज़िंदगी अब तिरी पेच-ओ-ताब है
उसने कहा ख़राब हूँ गर्दिश-ए-चश्म-ए-मस्त से
मैंने कहा कि रक़्स कर सारा जहाँ ख़राब है
उसने कहा सबात भी है किसी शय को दहर में
मैंने कहा कि पाएदार गुलशन-ए-बू-तुराब है
उसने कहा 'सबा' ये सब राज़-ओ-नवाज़ ख़ूब है
मैंने कहा 'सबा' ये तो 'इश्क़ ही कामियाब है
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