ये बात नहीं हमको खुले दर न मिले थे
उड़ जाते पर उड़ने के लिए पर न मिले थे
अन्दाज़ा नहीं कितना सफ़र हम ने किया तय
रस्ते में हमें मील के पत्थर न मिले थे
हम सोच रहे थे कि जलाएगी हमें आग
शोले भी हमें फूलों से बेहतर न मिले थे
अब तक किसी क़ातिल का निशाँ हाथ न आया
लाशें तो मिली थीं हमें ख़ंजर न मिले थे
सूरज के तबस्सुम को समोया जो नज़र में
फिर हमको कभी मोम के पैकर न मिले थे
दो उजले परिंदों का जो लौटा दिया पैग़ाम
उस दिन से हमें छत पे कबूतर न मिले थे
इक रूप अनोखा इसी पत्थर से निकलता
हम बुत बने होते हमें आज़र न मिले थे
पानी में जो उतरे तो बदन भी नहीं भीगे
दरिया को 'सबा' हम से शनावर न मिले थे
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