कोई नज़र हो ठहरती है एक पल के लिए
मिरे बदन में कोई बात है ग़ज़ल के लिए
मैं चाहती हूँ तुझे आज ख़ूब प्यार करूँँ
कोई तो याद बचा लूँ मैं अपने कल के लिए
किसी भी तरह सितारे ज़मीं पे ले आऊँ
मैं ग़म-ज़दा हूँ इसी प्यार के महल के लिए
तुम्हारे 'इश्क़ ने सारी ख़ुशी मुझे दी, और
ये इंतिक़ाम भी पहलू बदल बदल के लिए
सवाल-ए-कैफ़ पे सब मय-गुसार हाथों ने
शराब-ए-ग़म के पियाले सँभल सँभल के लिए
मैं ख़्वाहिशों का समुंदर न पार कर पाई
खड़ा था एक फ़रिश्ता मिरी ग़ज़ल के लिए
ख़ुशी से जी ले 'सबा' ग़म का सामना कर ले
यही है तर्ज़-ए-अमल अब तिरे अमल के लिए
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