दिल की बढ़ती हुई बेताबी का हल सोचेंगे
आज की रात कोई अच्छी ग़ज़ल सोचेंगे
हमने इस शान से ग़ुर्बत के भी दिन काटे हैं
सदियाँ सोचेंगी बरस सोचेंगे पल सोचेंगे
मोहलतें देगा ग़म-ए-इश्क़ जहाँ तक हमको
हम वहाँ तक ग़म-ए-दौराँ का बदल सोचेंगे
याद आएगी बहुत झील सी आँखें उसकी
जब भी खिल कर मिरे ज़ख़्मों के कमल सोचेंगे
क्या तग़ज़्ज़ुल की ये मेराज नहीं है ऐ दोस्त
गीत वाले भी ये कहते हैं ग़ज़ल सोचेंगे
रुख़ बदलते हुए हालात के बारे में 'सबा'
हम न सोचेंगे तो क्या अहल-ए-दवल सोचेंगे
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