निकले जो कल क़रीब से उन के मकाँ के हम
शाइ'र शुमार हो गए उर्दू ज़बाँ के हम
डरते रहे जो ज़िक्र से दर्द-ओ-निहाँ के हम
क़िस्से सुना गए उन्हें सारे जहाँ के हम
हर शख़्स के रफ़ीक़ हों हर दिल में हों अज़ीज़
कहिए कि पुर-हसीन हैं ऐसे कहाँ के हम
कोई फ़क़ीर समझा कोई नीम-जाँ मरीज़
रहमत की भीख माँगा किए दिल-गवाँ के हम
आसाइशें जहान की क़दमों में हैं मगर
आलाम उठा रहे हैं दिल-ए-नातवाँ के हम
जन्नत में हाथों-हाथ लिए जाएँगे हमीं
हैं बादशाह आप यहाँ के वहाँ के हम
दिल में तो उन के और किसी का गुज़र नहीं
मालिक बिला शरीक़ हैं सारे मकाँ के हम
अपना ज़मीर पाक किसी से गिला नहीं
अब तो हैं राह-ए-इश्क़ में हर कारवाँ के हम
— divya 'sabaa'















