यूँँ हुई रुस्वा रिहा होने की तदबीरें कि बस
इस क़दर मज़बूत थीं पैरों की ज़ंजीरें कि बस
हम-नवाओ क्या यक़ीं इन रह-नुमाओं पर करें
इतनी क़स
में इतने वा'दे इतनी तक़रीरें कि बस
हाल भी नाकाम है नाकाम मुस्तक़बिल भी है
ख़ाक में ऐसी मिलीं ख़्वाबों की ता'बीरें कि बस
आज तक भी जिन
में ख़ुशबू है हमारे ख़ून की
इतने सस्ते भाव पर बिकती हैं तहरीरें कि बस
जानी पहचानी सी शक्लें अजनबी लगने लगीं
इतनी धुँधली हो गई यारों की तस्वीरें कि बस
सर यहाँ जिसने उठाया अपने हक़ के वास्ते
इस क़दर उस पे तनीं ऐ दोस्त शमशीरें कि बस
नाम-वर होना मिरा अब हो गया लाज़िम 'सबा'
जा-ब-जा होने लगी हैं ऐसी तशहीरें कि बस
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